नागराज और शक्तिमान हमारे अपने सुपरहीरो थे… फिर हम उन्हें भूल क्यों गए?

By ZealPlane Editorial | Senior Pop Culture & Manga Analyst | ZealPlane Chronicles

नागराज और शक्तिमान हमारे अपने सुपरहीरो थे… फिर हम उन्हें भूल क्यों गए?

क्या आपको वो दिन याद हैं जब स्कूल की आखिरी घंटी बजते ही दिल में बस एक ही धड़कन होती थी—"बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन वाले स्टॉल पर नई राज कॉमिक्स आई या नहीं?" दस या पंद्रह रुपये की वो रंगीन किताब जब हाथ में आती थी, तो लगता था जैसे पूरी दुनिया की खुशी मिल गई हो। घर पहुंचते ही बस्ता एक तरफ फेंकना, कूलर के आगे फर्श पर लेट जाना और उस ताज़ा छपे पन्नों की खुशबू सूंघते हुए कॉमिक खोलना... 90s के बच्चों के लिए इससे बड़ा कोई सुकून नहीं था।

आज जब मार्वल या डीसी की कोई नई फिल्म आती है, तो हफ्तों पहले से इंटरनेट पर थ्योरीज़, मीम्स और क्रेज़ दिखने लगता है। पहले दिन के टिकट मिनटों में बुक हो जाते हैं। लेकिन भारत में सुपरहीरो का यह दीवानगी भरा माहौल कभी बाहर का मोहताज नहीं था। यह वही देश है जहां कभी नागराज की विष-फुंकार, सुपर कमांडो ध्रुव का दिमाग, डोगा की गोलियों की तड़तड़ाहट और टीवी पर शक्तिमान का घूमना हर गली-मोहल्ले में छाया रहता था।

फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि जिस देश के पास अपने इतने दमदार सुपरहीरो थे, उसकी नई पीढ़ी इन नामों को लगभग भूल ही गई? हमारे किरदार किसी भी मायने में कमजोर नहीं थे; हम बस उन्हें समय के साथ आगे बढ़ाने और दुनिया के सामने सही तरीके से पेश करने में चूक गए।

वो सिर्फ कॉमिक्स नहीं थीं, हमारा अपना देसी मार्वल-डीसी था

उस ज़माने में जब हाथ में स्मार्टफोन नहीं था, भारतीय कॉमिक्स हमारे लिए सबसे बड़ा एडवेंचर थीं। 1980 के दशक के आखिर में जब परशुराम शर्मा और संजय गुप्ता ने नागराज को गढ़ा, तो उन्होंने भारत की पुरानी नाग-कथाओं को एक मॉडर्न साइंस-फिक्शन अवतार दे दिया। नागराज के खून में दौड़ने वाले लाखों जहरीले सूक्ष्म सर्प, उसकी रस्सी की तरह फैलने वाली सर्प-रस्सियां, और प्रोफेसर नागमणि, मिस किलर, थोंगा और नागपाशा जैसे खूंखार विलन... जब यह सब पन्नों पर उतरता था, तो दिल की धड़कनें थम जाती थीं।

If Nagraj and Shaktimaan clashed in a crossover comic, who would win?

Comparing venomous serpent arsenal against cosmic elemental powers.

इसके बाद लेखक-चित्रकार अनुपम सिन्हा ने रचा भारतीय कॉमिक्स का सबसे अनोखा हीरो—सुपर कमांडो ध्रुव। ध्रुव के पास उड़ने या दीवारें तोड़ने जैसी कोई जादुई सुपरपावर नहीं थी। जुपिटर सर्कस में बड़े हुए इस लड़के के पास सिर्फ सर्कस की कलाबाज़ियां, फिजिक्स के नियम और उसका कभी हार न मानने वाला दिमाग था। जब राज नगर की सड़कों पर ग्रैंडमास्टर रोबो, चंडकाल, महामानव या बौना जैसे विलन आतंक मचाते थे, तब ध्रुव अपनी सूझबूझ और स्टार-बेल्ट के दम पर शहर बचाता था। हर मिडिल क्लास बच्चा खुद को ध्रुव में देखता था, क्योंकि वह सिखाता था कि सुपरहीरो बनने के लिए भगवान से वरदान नहीं, मजबूत इरादे चाहिए होते हैं।

Pralay - Nagraj aur Super Commando Dhruva Raj Comics
राज कॉमिक्स विशेषांक 'प्रलय' — जब नागराज और ध्रुव की टक्कर ने कॉमिक्स प्रेमियों के होश उड़ा दिए थे

दूसरी तरफ तरुण कुमार वाही और मनु का रचा हुआ किरदार था डोगा। डोगा बच्चों वाली मासूमियत से कोसों दूर था। मुंबई के सीवरों में लावारिस पलने वाला सूरज, जिसे अदरक चाचा, हल्दी चाचा, धनिया चाचा और काली मिर्च चाचा ने पाला था, लायन जिम में खुद को लोहे जैसा मजबूत बनाता है। जब वह चेहरे पर कुत्ते का मुखौटा पहनकर चार-चार पिस्तौलों के साथ निकलता, तो उसका कानून सीधा था—अपराधी को समझाने का समय गया, अब सीधे इंसाफ होगा। यह भारत का पहला असली डार्क एंटी-हीरो था, जिसने साबित किया कि भारतीय कॉमिक्स में गंभीर और रियलिस्टिक कहानियां भी लिखी जा सकती हैं।

और फिर 1997 में दूरदर्शन पर आया मुकेश खन्ना का शक्तिमान। हर रविवार दोपहर 12 बजे जैसे पूरे देश में कर्फ्यू लग जाता था। बच्चे टीवी से चिपके रहते थे, पंडित गंगाधर विद्याधर मायाधर ओंकारनाथ शास्त्री के दातों और चश्मे पर हंसते थे, और जैसे ही 'तामराज किल्विस' का "अंधेरा कायम रहे" गूंजता, शक्तिमान के 'पाव-पाव' घूमकर आने का इंतज़ार करते थे। शक्तिमान ने दिखा दिया था कि अगर हमारे सुपरहीरो को स्क्रीन मिल जाए, तो वो पूरे देश को एक साथ बांध सकते हैं।

किरदारों में कोई खोट नहीं था, कमी थी विज़न और बिज़नेस में

बहुत से लोग आसानी से कह देते हैं कि हॉलीवुड के सामने हमारे सुपरहीरो इसलिए नहीं टिके क्योंकि वो बचकाने थे। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। नागराज के शरीर में सूक्ष्म सर्पों का बायोलॉजिकल कॉन्सेप्ट पश्चिमी कॉमिक्स से कहीं ज्यादा ओरिजिनल था। ध्रुव को अगर बैटमैन के सामने रखें, तो ध्रुव बिना ब्रूस वेन के अरबों डॉलर के गैजेट्स के केवल अपनी बुद्धि से पूरे राज नगर को बचाता था।

फर्क कहानियों में नहीं था, फर्क था उस बिज़नेस को आगे बढ़ाने के तरीके में। मार्वल और डीसी ने बहुत पहले समझ लिया था कि सिर्फ 30 पन्नों की कागज़ी कॉमिक बेचकर वे हमेशा प्रासंगिक नहीं रह सकते। उन्होंने कॉमिक्स को कार्टून बनाया, कार्टून से बड़ी फिल्में बनाईं, वीडियो गेम्स बनाए और खिलौनों से लेकर टी-शर्ट तक बेचीं। एक बच्चा कॉमिक न भी पढ़े, तो भी स्पाइडर-मैन का बैग लेकर स्कूल जाता है और बैटमैन की टी-शर्ट पहनता है।

Super Commando Dhruva Jupiter Circus Stunt Art
जुपिटर सर्कस का वो जांबाज अंदाज — सुपर कमांडो ध्रुव की यह कलाबाज़ियां हर बच्चे के दिल में बस गई थीं

वहीं हमारे देश के पब्लिशर्स 2000 के दशक में भी सिर्फ 15-20 रुपये की कागज़ी किताबों और बस स्टैंड के स्टॉल्स तक ही सीमित रह गए। जब 90s के आखिर में घर-घर में केबल टीवी और कार्टून नेटवर्क आ गया, और बाद में स्मार्टफोन और 4G डेटा हाथ में आया—तो विदेशी सुपरहीरो स्क्रीन पर रंगीन एनिमेशन में कूदने लगे, जबकि हमारे भारतीय हीरो स्थिर कागज़ पर ही फंसे रह गए। ऊपर से पब्लिशर्स के बीच आपसी पारिवारिक बंटवारे, कॉपीराइट के झगड़े, और डिजिटल दौर में ऐप या वेबसाइट न बनाने की वजह से नई पीढ़ी से इनका सीधा नाता टूट गया। इस बिज़नेस मॉडल की चूक को आज के नए राइटर्स जापान की मंगा इंडस्ट्री की सफलता से समझ रहे हैं।

सबसे बड़ी भूल: समाज का यह सोचना कि "कॉमिक्स तो सिर्फ बच्चों की चीज़ है"

हमारे समाज की एक बहुत बड़ी सोच यह रही कि कॉमिक्स को हमेशा बचकाना मान लिया गया। जैसे ही कोई बच्चा 10वीं या 12वीं में पहुंचता, घरवाले और रिश्तेदार कहने लगते—"अब बड़े हो गए हो, ये कॉमिक्स-कार्टून पढ़ना बंद करो और पढ़ाई पर ध्यान दो।" कॉमिक्स पढ़ने को समय की बर्बादी समझा गया।

इसके उलट, जापान और पश्चिमी देशों ने अपने पाठकों के साथ अपनी कहानियों को भी मैच्योर किया। जापान में टीनेजर्स के लिए 'शोनेन' मंगा हैं, तो वहीं कॉलेज और नौकरीपेशा युवाओं के लिए 'सीनेन' मंगा लिखे जाते हैं। टोक्यो की मेट्रो में 35-40 साल के कामकाजी लोग भी मंगा पढ़ते हैं। वहां कॉमिक्स एक सम्मानित कला मानी जाती है, न कि सिर्फ बच्चों का खिलौना।

Doga Ka Encounter Raj Comics Cover
'डोगा का एनकाउंटर' — एक ऐसी कहानी जिसने साबित किया कि भारतीय कॉमिक्स बच्चों के लिए ही नहीं, वयस्कों के लिए भी बेहद दमदार हो सकती हैं

जब हमारे यहां पढ़ने का यह कल्चर पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर नहीं हो पाया, तो पाठक वर्ग सिमट गया। और जब उन बच्चों को स्मार्टफोन और गेम्स मिल गए, तो कॉमिक्स की बिक्री अचानक गिर गई। यही वजह है कि आज जब हम भारतीय इंडी कॉमिक्स के नए दौर की बात करते हैं, तो सबसे पहले हमें अपनी कहानियों को मैच्योर और अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाना होगा।

क्या नागराज, ध्रुव और हमारे देसी हीरोज़ की वापसी मुमकिन है?

आज समय बदल चुका है। 90s में किसी कहानी को लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रिंटिंग प्रेस, ट्रकों और दुकानों की जरूरत होती थी। आज का सबसे बड़ा हथियार इंटरनेट और मोबाइल स्क्रीन है। आज एक इंडी क्रिएटर अपने घर बैठकर डिजिटल कॉमिक बना सकता है, वेबटून फॉर्मेट में डाल सकता है और सीधे लाखों पाठकों तक पहुंच सकता है—जैसा कि आज के पाठक मुफ्त ऑनलाइन कॉमिक प्लेटफॉर्म्स पर महसूस कर रहे हैं।

लेकिन आज मुकाबला भी आसान नहीं है। आज के युवा के पास Attack on Titan, Solo Leveling और मार्वल जैसी दुनिया है। इसलिए सिर्फ 'देसी' होने के नाम पर कोई पाठक नहीं जुड़ेगा। कहानी में आज का दम होना चाहिए, आर्ट में पैनापन होना चाहिए और स्क्रीनप्ले ऐसा होना चाहिए जो पहली ही नज़र में बांध ले।

Shaktimaan First Indian Superhero Mukesh Khanna
दूरदर्शन का वो दौर — जब शक्तिमान सिर्फ एक टीवी धारावाहिक नहीं, पूरे देश का संस्कार बन चुका था

नागराज को स्पाइडर-मैन बनने की जरूरत नहीं है, न ही ध्रुव को हॉलीवुड की नकल करनी है। भारत के पास अपनी अनगिनत पौराणिक कथाएं, लोककथाएं और गहरे इंसानी जज्बातों का वो खजाना है जो दुनिया में किसी के पास नहीं है—जैसे कि हाल ही में रामायण ग्राफिक नोवेल और अंतरराष्ट्रीय ट्रेलर के प्रति दिखा उत्साह साबित करता है।

वह 90s का बच्चा जिसने नागराज और ध्रुव के पन्नों को रात में टॉर्च की रोशनी में पढ़ा था, आज भले ही बड़ा हो चुका हो, लेकिन अपनी ही मिट्टी से निकले एक सच्चे और दमदार सुपरहीरो के लिए उसके दिल में आज भी वही जगह खाली है। सुपरहीरो कभी खत्म नहीं होते, वो बस एक सही कहानीकार का इंतज़ार करते हैं जो उन्हें आज की पीढ़ी के सामने नए कलेवर में जिंदा कर सके।

देसी कॉमिक्स का मज़ा: फिक्शन कॉमिक्स के ऑफिस में काम करने वाले टीनेजर 'पगला दादू' और 'सांडो की दुनिया' पढ़ें।
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